Saturday, 31 July 2021

बस जिंदगी यही है

कुछ बातें कही हैं,
कुछ अनकही है,
जो है,
बस जिंदगी यही है | 

कभी गलत है,
और कभी सही है,
जो है,
बस जिंदगी यही है | 

खाता है, बही है,
जो है,
बस जिंदगी यही है | 

टूट चुकी इस कलम में 
बाकी अब भी थोड़ी स्याही है,
पर फिर भी जो है,
बस जिंदगी यही है | 

जब तलक है,
यही है,
उसके बाद तो 
फिर कुछ भी नहीं है | 

Sunday, 15 November 2020

दीवाली

कल दीवाली थी,
आज दीवाली के बाद की सुबह है | 
दीवाली के बाद की वो सुबह, 
जब दीये बुझ चुके होते हैं, 
फर्श पर दीयों से रिसता हुआ तेल लगा होता है,
मोमबत्तियां पिघल चुकी होती हैं, 
धूप बत्ती जलने के बाद बस राख बची होती है,
रास्ते पटाखों के फर्रों से पटे होते हैं,
रसोईघर में मिठाई के खाली डब्बे फैले होते हैं, 
पकवानों के बर्तन खाली पड़े होते हैं,
दोस्त रिश्तेदार जा चुके होते हैं,
एक ख़ामोशी होती है,
अजीब सी एक ख़ामोशी | 

अखरती तो आखिर, 
दीवाली की अगली सुबह है | 

कल दीवाली थी,
बीत गयी, अच्छी गुजरी | 
अब जो दीवाली ख़त्म हो गयी,
दीये सारे बुझ गए, 
तो बताओ, आखिर
अंधकार पर रौशनी की
जीत हो पायी कि नहीं ?

Monday, 26 October 2020

किताब

किताबों में मेरी एक दुनिया है, 
जो बस चंद अक्षरों के दरम्यां है | 
किताबों से निकलते कितने अल्फ़ाज़ हैं, 
किताबों में फिर छुपे कितने राज़ हैं 

जिंदगी जीना हो तो, 
किताबों के माफ़िक़ जीना | 
किताबों में बस कहानियां जुड़ती हैं, 
लिखी बात कभी वापस नहीं होती | 
जिंदगी में जो भी किया, 
कभी वो वापस नहीं होना चाहिए | 
जिंदगी के किसी पन्ने का 
अफ़सोस नहीं होना चाहिए | 

पर जिंदगी कभी अगर
खाली किताब पकड़ा दे,
तो उसमें कहानी लिखने मत बैठ जाना,
कहानियां पढ़ना जरूर पर | 
असली कहानी लिखी नहीं 
जी जाती है बस | 

तुम जिस किताब में
किसी और की कहानियां पढ़ रहे हो, 
वो किताब उसने नहीं
किसी और ने लिखी है | 
तुम्हारी कहानी लिखने वाले भी 
हज़ारों मिलेंगे |  
बस, कहानी ऐसी रखना कि
किताब लिखने वाले के पास
वक़्त कम पड़ जाए | 

Sunday, 6 September 2020

दिन-रात

दिन दिन होता है ,
और रात रात होती है | 
क्या करूँगा मैं, जब
दिन और रात का अंतर मिट जाए ?
जब दिन भी अंधेर हो जाए 
या, फिर रात भी उज्ज्वलित हो उठे ?
क्या करूँगा मैं तब ?
आप क्या करेंगे ? 

जब, 
रात के वो ढाई बजे वाले ख्यालात, 
दिन के दूसरे पहर में, 
तल्खी सी डेढ़ बजे वाली 
धूप में चुभने लगे,
तो तुम ही बताओ, क्या 
महसूस करूँअब मैं, 
अच्छा हुआ या बुरा?

जब 
गर्मी की छुट्टियों के दिनों वाली 
दुपहरी की खामोशी 
रातों को भी अखरने लगे 
तो तुम ही बताओ, क्या 
महसूस करूँअब मैं, 
अच्छा हुआ या बुरा?

अच्छा,
यूँ की रात अब अकेली नहीं 
उसे दिन का सहारा मिल गया है, 
रात सहम नहीं जायेगी यकायक | 

बुरा, 
यूँ कि पहले अमां, 
कम से कमएक वक़्त का तो चैन था, 
अब तो दिन रात दोनों चौपट हो बैठे | 

Sunday, 2 August 2020

शीशमहल

आओ,
स्वागत है तुम्हारा 
मेरे शीशमहल में | 
बड़ी ही सुन्दर, 
बड़ी ही नाजुक, 
मेरे आलीशान शीशमहल में | 

इस महल के चारों दीवारों में 
बस मेरा ही प्रतिबिम्ब है, 
मुझे खुद की आवाज 
गूँजती सुनाई देती है |  
मैंने खुद को खुद की 
बेड़ियों का कैदी बना रखा है | 
इस महल से बाहर जाना 
मुझे गवारा भी नहीं, क्यूँकि 
बाहर जाने वाली राह पर 
मुझे मैं नहीं दिखता हूँ | 
मुझे मेरा ये शीशमहल 
जैसे लील गया है,
हाय, ये मेरा 
रहयस्यमयी शीशमहल | 

जीवन भी तो एक शीशमहल ही है,
इसकी दीवारों से बस 
एक तरफ़ा दीदार होता है |  
मैं अपने बाहर देख सकता हूँ, 
पर, तुम मेरे अंदर नहीं देख सकते, 
मैं खुद अपने अंदर नहीं देख सकता | 
क्या फायदा ऐसी दीवारों का ? 
क्यूँ रहूँ मैं ऐसे शीशों में क़ैद ?
टूट जाने दो इसे, 
कम से कम शीशे से बाहर 
मैं आज़ाद तो उड़ सकूँ | 

मैं काँच की दीवारों पर 
हाथों से वज्र प्रहार करता हूँ, 
जब इसे तोड़ नहीं पाता मैं, तो,
जोर जोर से अपना सर भी पीटता हूँ | 
खुद के खूं में सराबोर, 
खुद के चोटिल लोथड़े से घिरा,
दम घुटने लगा है, 
सांस रुकने लगी है, 
पर, ये मेरा शीशमहल 
ना ही टूटता है 
और,
ना ही मेरा इससे साथ छूटता है | 
ये विचित्र मेरा शीशमहल | 

महल के बाहर लोगों का जमावड़ा है, 
लोग उत्सुकता से मुझे देखते 
बस गुजरते जा रहे हैं | 
शीशे के पीछे से मैं उन्हें 
एक झूठी तस्वीर दिखा रहा हूँ | 
सच तो ये है कि, हम 
झूठ की बिसात पर ही 
अपनी जिंदगी जीते आये हैं | 
एक माया है ये शीशमहल,
ये शीशमहल तो केवल 
एक दिखावा है | 

जाओ,
चले जाओ 
मेरे शीशमहल से | 
बड़ी ही बदसूरत,
बड़ी ही कुटिल, 
मेरे शीशमहल से | 

Tuesday, 23 June 2020

जिंदगी

जिंदगी
कभी खुशियों से नहीं बनती,
परेशानियों और
उलझनों से बनती है |
जिस लम्हे आप खुश नहीं होते हैं ,
वो पल आपकी जिंदगी के
रंग-रूप और रस्ते तय करते हैं |

जब खुश होते हैं,
तब नहीं सोचते
ये कैसे हुआ |
पर, जब खुश नहीं होते
तब सोचते हैं,
कहाँ क्या बिगड़ा,
कैसे मैं जिंदगी के इस
मोड़ पर आ खड़ा हुआ हूँ |
और उस एक लम्हे में फिर
आप अपनी जिंदगी
तय कर लेते हैं |

जिंदगी आखिर इतनी कब
उलझ गयी कि, अब
इसमें खुशी ढूंढनी पड़ती है,
और वो भी वहां से
जहाँ उसका घर भी नहीं है |
ख़ुशी क्यूँ हमेशा नहीं रहती ?
क्यूँ कमल की राह
कीचड़ से निकलती है ?

Sunday, 21 June 2020

भीड़

भीड़ का हिस्सा मत बनो 
भीड़ के पीछे भागने वाले  
भीड़ में ही गुम हो जाते हैं 
भीड़ में किसी की कोई 
फरीद पहचान नहीं होती 
उसकी अपनी एक पहचान होती है 
पर तुम्हारी कोई शनाख्त नहीं होती 

भीड़ का हिस्सा मत बनो 
भीड़ से केवल कोरोना जैसी
भयानक बीमारियां फैलती हैं 
भीड़ से कभी कोई
अच्छी चीज नहीं आती 
भीड़ के पीछे मत भागो 

भीड़ का युद्ध,
ना ही कर्म युद्ध होता है,
और ना ही धर्म युद्ध 
जिस युद्ध में धर्म और कर्म 
दोनों ही नदारद हो,
उस युद्ध के सैनिक मत बनो 
भीड़ का हिस्सा मत बनो 

Friday, 22 May 2020

एकत्व

कोई अर्थ नहीं, किसी 
और के स्तित्व का यहाँ | 
एक ये मेरा जीवन है, 
और, ये एकमात्र 
मेरा एकत्व है |

ऊपर कौन भगवान,
और, नीचे कौन शैतान,
कुछ मायने नहीं 
किसी के भी यहाँ | 
कुछ है तो, 
मिला जुला कर 
मैं ही हूँ बस |
कोई और नहीं यहाँ ,
बस एक मैं हूँ 
और एक मेरा एकत्व है |

ये सभ्यता समाज,
ये दोस्त परिवार ,
सब क्षणिक हैं |
ये रंग रूप, 
ये दौलत शोहरत, 
सब सामयिक हैं | 
जो कुछ अक्षय है, 
वो एक मैं हूँ बस | 
एक मेरा जीवन है, 
और एक ये मेरा एकत्व है |

Sunday, 17 May 2020

वक़्त वक़्त की बात

वक़्त वक़्त की बात है,
कल जो खुदा था,
आज वही जुदा है |
बस वक़्त वक़्त की बात है |

कल जिन टूटी पलकों को
हाथों पर रख कर,
आँखें मूँद कर,
दुआएं माँगा करते थे,
और फिर हलके से फूँक कर
जिन्हे हम उड़ा देते थे,
आज वही टूटी पलकें
आँखों में चुभती हैं,
और मैं फिर से
उन्हें फूँक लगा कर
उड़ा देता हूँ |

वक़्त वक़्त की बात है,
कल जो दुआ थी हमारी,
आज वही दवा का सबब है |
बस वक़्त वक़्त की बात है | 

Monday, 27 April 2020

कविता

जब किसी की कविता सुनता हूँ मैं,
तो वाहवाही नहीं देता उनको |

ये एक ऐसी चीज है जो
आप तय नहीं कर सकते,
ऐसा नहीं होता है कि, चलो
आज एक लिख कर ही मानूँगा |
ये प्यार मोहब्बत सरीके बात है,
बस हो जाती है,
दिल में कोई बात आ जाती है,
और खुद को बयां कर जाती है बस |

जब किसी की कविता सुनता हूँ मैं,
तो वाहवाही नहीं देता उनको |
मुझे मालूम है कि
वो भी किसी दर्द से, या
किसी नाज़ुक वक़्त से गुजर रहे होंगे,
और उस वक़्त ये बात उसके ज़ेहन में आयी होगी |
मुझे मालूम है क्यूँकि,
मैं भी तो ऐसे ही लिखता हूँ |

जब दर्द साझा करने के लिए कोई नहीं होता,
तब ऐसे ही पन्नों के साथ बातें बाट लेता हूँ |
कभी पुराने पन्ने पलट कर देखता हूँ,
तो हैरानी भी होती है,
और ताक़त भी महसूस होती है,
कि कल क्या माहौल थे, और
आज उन सब से लड़ कर, जीत कर
मैं आगे निकल आया हूँ |
तुम साथ नहीं तो क्या गम है,
उन पन्नों के साथ ही सही,
मैं तुम्हारे हिस्से का भी इश्क़ जी आया हूँ |

जब किसी की कविता सुनता हूँ मैं,
तो वाहवाही नहीं देता उनको,
बस मुस्कुरा देता हूँ हल्के से |
और, पलकें नम हो जाती हैं
तो, रोकता नहीं खुद को,
बस सर उठा कर जी लेता हूँ हल्के से | 

Wednesday, 25 March 2020

जहर का प्याला

तुमने अपने हाथों में जो
थाम रखा है, वो
जहर का प्याला है |
जिस पल वो ज़हर
तुम्हारे लबों में लगेगा ,
उस पल में फिर
चाहे तुम समुद्र मंथन का
अमृत ही क्यों न पी लो,
तुम्हारी मृत्यु निश्चित है |

आखिर,
ये तुम्हारा निर्णय है |
तुम चाहो तो,
उस प्याले को
नकार सकते हो |
प्यास से सही, पर
तुम्हारी मृत्यु निश्चित है |

अगर जीवन से इतना ही
मोह है तुम्हें,
तो सुनो,
तुम खुद के लिए
नया प्याला क्यों
नहीं ले आते हो ?  

मुहूर्त

तुम क्या बात करते हो ?
तुम ये क्या सही समय का
इंतज़ार करते हो ?
तुम ये क्या पंडितों से,
तुम ये क्या मौलवियों से,
ये मुहूर्त ढूढ़ते फिरते हो ?
तुम ये क्या सही समय का
इंतज़ार करते हो ?

तुम इंसान हो, या
फिर तुम शैतान हो,
या कोई जीव जान,
ना तुम्हारा जन्म
मुहूर्त देख कर हुआ था,
ना तुम्हारी मृत्यु
मुहूर्त देख कर होगी |

जब ये पूरी कहानी
बस जीवन और मृत्यु के
दरम्यां ही सिमटी है,
तो फिर आख़िरकार,
तुम ये क्या सही मुहूर्त का
इंतज़ार करते हो ?

शहर

शहर ये मेरा इतना तंग क्यों है
शहर का मेरे आज ये रंग क्यों है
यहाँ मकानों से चिपके मकान ऐसे
कि जैसे दो प्रेमी जोड़े हों
जिनके बीच कोई न आ सके
पर खिड़की खोलूं तो
सूरज नहीं दिखता
रौशनी का एक कतरा भी
नसीब नहीं होता
शहर ये आज मेरा
इतना तंग क्यों हैं

इस शहर में मुझे फलक का दीदार
होता भी है और, नहीं भी होता
जब बिजली चली जाती है
और मैं अपने घर की
आधी बनी छत पर सोता हूँ
तो सितारों भरा आसमां दिख तो जाता है
पर जब यूँ ही घर से बाहर निकलता
तो बिजली के तारों से
वही आसमां ढक जाता है
आखिर शहर ये मेरा
इतना तंग क्यों हैं

आज चौराहे पर भरे बाजार में
जब इंसानियत का इंतक़ाम हो रहा
तो फिर, शहर ये मेरा अपंग क्यों है
आज गगन नील नहीं लहू से
पटा सा जान पड़ता है
और, शहर ये मेरा पूछता ये रंग क्यों है
आज जब फैसले सारे
कागज और कलम से होने थे
तो, शहर ये मेरा पूछता ये जंग क्यों है

आखिर शहर ये मेरा तंग क्यों है
आखिर शहर ये मेरा तंग क्यों है 

Saturday, 23 March 2019

कभी नहीं

मेरी डायरी के वो सूखे मुरझाये फूल
जो मैंने कभी तुम्हे दिए ही नहीं

वो छत के कोने में रखी टूटी कुर्सी
जिसपे हम कभी साथ बैठे ही नहीं

वो छज्जे पर छुपा कर रखे पटाखे
जो हमने दिवाली में कभी जलाये नहीं

वो अलमारी में कपड़ो के तह के नीचे छुपाये खत
जो मैंने कभी हाथों में रख कर पढ़े ही नहीं

वो दिल में रखी एक बात
जो कभी मैंने तुमसे कही नहीं

वो तुम्हारे साथ वाली एक जिंदगी
जो शायद मैंने कभी जी ही नहीं 

Sunday, 10 February 2019

False Ink

I write,
Because I’m addicted to.
Sometimes poetry,
Sometimes stories,
Or sometimes, just some random
Articles to help you figure out
Rights and wrongs of life.
I fill up my pen with Ink,
I don’t talk much,
I let my Ink do the talking.
I fill up the paper with this Ink.
I write,
Because I’m addicted to.

What do you think,
Why do I write?
Because I go through
All this in my life?
No, you are mistaken.
I write,
Just to entertain myself.
I live a life full of
Imaginations.
I write,
Because I’m addicted to.

This Ink that I’m
Pouring into my pen,
Don’t try to find traces
of truth in there.
I have invented a false Ink.
The Ink which takes me away,
From all the bitter truths
Of this cruel world.
I write false stories,
I write with a False Ink.
I write,
Because,
I’m addicted to.

You won’t stop reading,
If I write with false Ink,
Will you?

झूठी स्याही

मैं लिखता हूँ,
आदत है लिखने की।
कभी कविताएं,
तो कभी कहानियाँ,
कभी कभी तो बस,
ऐसे ही सही गलत
तुम्हे समझाने के बहाने,
कुछ लिख लेता हूँ।
मैं कलम में स्याही भरता हूँ,
मैं स्याहियों में बातें करता हूँ,
मैं स्याही से लिखता हूँ।
मैं लिखता हूँ,
आदत है लिखने की।

तुम्हें क्या लगता है,
क्यों लिखता हूँ मैं?
क्यूँकि मैं इन
सब से गुजरता हूँ ?
नहीं, मैं तो बस यूँ ही
मन बहलाने के लिए
लिखता हूँ।
मैं कल्पनाओं से सराबोर
एक जिंदगी जीता हूँ,
मैं लिखता हूँ,
आदत है लिखने की।

ये जो कलम में मैं 
स्याही भर रहा हूँ, 
उसमे सच का कतरा 
मत ढूंढो तुम। 
मैंने एक झूठी 
स्याही बनाई है,
वो स्याही, जो मुझे 
दुनिया के कड़वे सच 
से दूर ले जाती है। 
मैं झूठ कहानियां लिखता हूँ, 
मैं झूठी स्याही से लिखता हूँ ,
मैं लिखता हूँ,
क्यूँकि,
आदत है लिखने की।

झूठी स्याही से लिखूंगा
अगर, तो
पढ़ना बंद नहीं कर दोगे न ?

Saturday, 9 February 2019

Abomination

Don’t call me by my name,
I don’t like my name.
Those piercing sounds of my name,
I don’t like that.
Though I’ve a name plate
On my door,
But, I don’t like my home.
On the top right corner of book,
I had written my name,
To state the ownership of it
I don’t like my book anymore.
My name was written on letters too,
That I had written to you
Now, I don’t like you either.
Sitting under the roof,
On a fine evening,
When i was turning pages
of yesterday,
I found one of me,
But, it wasn’t me.
Names hadn’t changed,
But probably I had.
With passing time,
I kept on wearing
A new layer of time,
Now, it’s like
I don’t like myself either.
When spring came,
New leaves sprouted,
Mango groves welcomed
Baby mangoes on-board ,
But, no one came to my garden.
That swing which we had set
years ago, in centre of our garden,
That’s empty,
Swinging with the breezes.
I was sitting in the corner,
Trying to forget our names.
That garden is still there,
I don’t like going there,
I don’t like myself either.

In Between

Beyond this side of life and,
Ascending the other side of life,
Between those two ends,
There was another city,
Hidden in plain sight.
The city, which
everyone had gone to,
But, nobody had visited it.
A life, that everyone had lived
But, nobody had lived it.
From this side of life,
With you on my side,
To that side of life,
without you on my side.
In between,
There were countless efforts
To be with you,
For us to be together.
How long were we together?
We were not even together.
From this side of life, having you,
To that side of life, not having you,
Maybe, I have had set aside
Something in my life too.
Beyond the sights of
That glaring sun
Hitting right in the eyes,
And, preceding the sights of
Pitch dark black clouds,
There were few more moments,
Moments of thunders,
Moments of lightning bolts,
The lightning, that
Everyone had seen,
But, nobody had seen it,
In a life that everyone had lived
But, nobody had lived it.

Never together

You be the night,
I'll be the day.
We'll never be together.
But, when you'll be about to leave,
And, I'll be about to arrive,
Or, when I'll be about to leave,
And, you'll be about to arrive,
In those mornings and evenings,
We'll meet for sure.
And in that silence,
It will make such beautiful noise,
That this world would
Never have witnessed before.
You be the ground,
I'll be the sky.
Between us, there will be
Distances of earth and sky.
But, we'll meet on the horizon.
Believe me, we'll meet for sure.
And, this world will be amazed,
To witness our meeting.
They'll paint pictures of that,
So mesmerising and beautiful
That this world would
Never have seen before,
Never have witnessed before.
On that horizon,
When that setting sun
will meet the rising moon,
Or, that setting moon
Will meet the rising sun,
And ask "how are you"
"It’s been so long since we met"
This world will be beautiful again.
We’ll meet only for moments,
But, we won’t be together
We’ll never be together.

Sunday, 20 January 2019

Interpretation

I have to express myself,
To you, it's long due.
But, I don't know how.
You are far away,
Across oceans and horizons.
How do I say it to you?

I am afraid to use words,
I am afraid to say something,
When I am not around you.
I love words,
Probably, words are the only thing
keeping us together.
But, this distance..
What if, words get jumbled,
Travelling across continents ?
What if, it's not exactly
What I want to say ?
What if, you interpret
Words differently?
I am afraid
Because I know,
A poem has
Thousands of interpretations.

On the other hand,
I know you will get it right
You will pick the right meaning,
Like you always do.
Isn't that only reason
I choose to write this?
Isn't that the only reason
I want to express myself?
To you.

But, again.
I don't know,
How will
you
interpret this.