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Sunday, 2 August 2020

शीशमहल

आओ,
स्वागत है तुम्हारा 
मेरे शीशमहल में | 
बड़ी ही सुन्दर, 
बड़ी ही नाजुक, 
मेरे आलीशान शीशमहल में | 

इस महल के चारों दीवारों में 
बस मेरा ही प्रतिबिम्ब है, 
मुझे खुद की आवाज 
गूँजती सुनाई देती है |  
मैंने खुद को खुद की 
बेड़ियों का कैदी बना रखा है | 
इस महल से बाहर जाना 
मुझे गवारा भी नहीं, क्यूँकि 
बाहर जाने वाली राह पर 
मुझे मैं नहीं दिखता हूँ | 
मुझे मेरा ये शीशमहल 
जैसे लील गया है,
हाय, ये मेरा 
रहयस्यमयी शीशमहल | 

जीवन भी तो एक शीशमहल ही है,
इसकी दीवारों से बस 
एक तरफ़ा दीदार होता है |  
मैं अपने बाहर देख सकता हूँ, 
पर, तुम मेरे अंदर नहीं देख सकते, 
मैं खुद अपने अंदर नहीं देख सकता | 
क्या फायदा ऐसी दीवारों का ? 
क्यूँ रहूँ मैं ऐसे शीशों में क़ैद ?
टूट जाने दो इसे, 
कम से कम शीशे से बाहर 
मैं आज़ाद तो उड़ सकूँ | 

मैं काँच की दीवारों पर 
हाथों से वज्र प्रहार करता हूँ, 
जब इसे तोड़ नहीं पाता मैं, तो,
जोर जोर से अपना सर भी पीटता हूँ | 
खुद के खूं में सराबोर, 
खुद के चोटिल लोथड़े से घिरा,
दम घुटने लगा है, 
सांस रुकने लगी है, 
पर, ये मेरा शीशमहल 
ना ही टूटता है 
और,
ना ही मेरा इससे साथ छूटता है | 
ये विचित्र मेरा शीशमहल | 

महल के बाहर लोगों का जमावड़ा है, 
लोग उत्सुकता से मुझे देखते 
बस गुजरते जा रहे हैं | 
शीशे के पीछे से मैं उन्हें 
एक झूठी तस्वीर दिखा रहा हूँ | 
सच तो ये है कि, हम 
झूठ की बिसात पर ही 
अपनी जिंदगी जीते आये हैं | 
एक माया है ये शीशमहल,
ये शीशमहल तो केवल 
एक दिखावा है | 

जाओ,
चले जाओ 
मेरे शीशमहल से | 
बड़ी ही बदसूरत,
बड़ी ही कुटिल, 
मेरे शीशमहल से | 

Sunday, 27 May 2018

अकेले ही चल पड़ा

जिंदगी का ये जो सफर है,
उसमे हमेशा तुम्हे एक
चुनाव करना पड़ेगा,
किसी के साथ चलो
या फिर दूर तक चलो।

मैं दूर तक जाने की
तलब रखने वालों में से हूँ,
पर, मुझे अकेला चलना
भी अखरता है।
अकेले चलने की
आदत में, मैं
शून्यता की ओर चल पड़ा। 
वैसे तो मुझे तब कुछ
पता भी नहीं पड़ा,
मैं खेल के नियमानुसार
अकेले ही चल पड़ा।

कल शनिवार को
काली बदरी वाली शाम में,
मैं बिना छाता लिए
यूँ ही निकल पड़ा।
फिर, एकांत में पार्क
में बैठा सोचने लगा,
क्या अकेला चलना सही है ?
तो अंदर से आवाज़ आयी,
वो फिर कभी सोचना,
अभी सही वक़्त नहीं है,
तुम खुश हो अकेले।
फिर मैं खेल के नियमानुसार,
हमेशा की तरह
अकेले ही चल पड़ा।

वो लैंप पोस्ट की
पीली धुंधली बत्ती
मुझे जैसे सहला रही थी,
कोई सवाल करने वाला नहीं,
कोई जवाब देने वाला नहीं,
वो सुनसान सड़क जैसे
मेरे सपनों का जहाँ था।
मैं खुद में मगन,
हँसता, मुस्कुराता,
खेल के नियमानुसार,
हमेशा की तरह
फिर अकेले ही चल पड़ा। 

Thursday, 18 January 2018

कुछ बात करनी है

मुझे कुछ बात करनी है
पता नहीं क्या कहूंगा 
वो तो नहीं सोचा है 
पर तुमसे मिलना है
थोड़ी देर ही सही 
कुछ कहना है सिर्फ  
कुछ न कुछ छोटा सा बस 
मुझे कुछ बात करनी है

अगर कहने को कुछ ना हुआ 
तो थोड़ी देर बस खामोशी से 
तुम्हारे साथ चलना है 
गर वो भी नहीं सही तो 
साथ बैठ रहना तुम 
चंद पलों के लिए बस 
तुमको तक लेंगे चुपचाप 
पता नहीं क्या क्यूँ, 
पर मुझे कुछ बात करनी है

अरसा हो गया मुझे 
जाने कब आखिरी बार 
बात की थी मैंने,
कोई तो इधर आओ,
कुछ नहीं तो तुम ही कह लेना,
मैं कम से कम सुन लूंगा
फिर तुम्हें सुनने का
नाटक करने के बहाने, मैं भी 
चुपके से बीच में कुछ कह लूंगा, 
मैं भी ऐसे कुछ बात कर लूंगा
मुझे तो बस कुछ बात करनी है

Monday, 30 October 2017

अकेलापन

कुछ तो बात है इक इसमें, जो
कोई हो तो भी साथ रहे , और जो
कोई ना हो तो और भी पास आए

जाने कितने ज़माने आए-गए,
जाने कितने एहसास छू कर गुजर गए,
कितनी सदियाँ और कितने ही मौसम
गरज़-बरस, तरस भी गए
पर बस एक ये जिद पे अड़ा था,
जो न गुजरा, ना ही बिखरा
न टूटा, न छूटा, भले दम जो मेरा घूँटा
जो हर मोड़, हर कदम, हर एक दम
मेरे साथ टिका खड़ा रहा,  वो था
अकेलेपन का खूंटा

जिसे देखो वो अकेलेपन से दूर जाना चाहे
भाई , एक बात बता मुझे,
ऐसी क्या तक़लीफ़ तुझे इसमें नज़र आए
इस बेदर्द दुनियादारी सा तो नहीं है ना
सपने बुनता, दिखाता, झकझोरता नहीं है ना
मौसम के साथ रंग बदलता नहीं है ना
जो ये कल था, वही आज भी है
गर कल को कुछ हुआ भी तो,
कल को बस ये तुम्हारी ओर और बढ़ेगा
गले लगाएगा , और जोर से चिपकेगा
उम्र भर का भरोसा है इसपे हमको ज़नाब
भरे बाजार में तार-तार बेज़ार शर्म-ओ-सार नहीं करेगा 

ये आग में तपाया, चमकाया, खरा सोना है
तुम क्या जानो क्या ऐसे साथी का होना है
ये मेरा है, बस मेरा अपना, इसमें मेरा अपनापन
पूरे ज़माने से ये अकेला भिड़ेगा, ये
मेरा अकेलापन |