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Sunday, 6 September 2020

दिन-रात

दिन दिन होता है ,
और रात रात होती है | 
क्या करूँगा मैं, जब
दिन और रात का अंतर मिट जाए ?
जब दिन भी अंधेर हो जाए 
या, फिर रात भी उज्ज्वलित हो उठे ?
क्या करूँगा मैं तब ?
आप क्या करेंगे ? 

जब, 
रात के वो ढाई बजे वाले ख्यालात, 
दिन के दूसरे पहर में, 
तल्खी सी डेढ़ बजे वाली 
धूप में चुभने लगे,
तो तुम ही बताओ, क्या 
महसूस करूँअब मैं, 
अच्छा हुआ या बुरा?

जब 
गर्मी की छुट्टियों के दिनों वाली 
दुपहरी की खामोशी 
रातों को भी अखरने लगे 
तो तुम ही बताओ, क्या 
महसूस करूँअब मैं, 
अच्छा हुआ या बुरा?

अच्छा,
यूँ की रात अब अकेली नहीं 
उसे दिन का सहारा मिल गया है, 
रात सहम नहीं जायेगी यकायक | 

बुरा, 
यूँ कि पहले अमां, 
कम से कमएक वक़्त का तो चैन था, 
अब तो दिन रात दोनों चौपट हो बैठे | 

Friday, 22 May 2020

एकत्व

कोई अर्थ नहीं, किसी 
और के स्तित्व का यहाँ | 
एक ये मेरा जीवन है, 
और, ये एकमात्र 
मेरा एकत्व है |

ऊपर कौन भगवान,
और, नीचे कौन शैतान,
कुछ मायने नहीं 
किसी के भी यहाँ | 
कुछ है तो, 
मिला जुला कर 
मैं ही हूँ बस |
कोई और नहीं यहाँ ,
बस एक मैं हूँ 
और एक मेरा एकत्व है |

ये सभ्यता समाज,
ये दोस्त परिवार ,
सब क्षणिक हैं |
ये रंग रूप, 
ये दौलत शोहरत, 
सब सामयिक हैं | 
जो कुछ अक्षय है, 
वो एक मैं हूँ बस | 
एक मेरा जीवन है, 
और एक ये मेरा एकत्व है |

Sunday, 6 January 2019

Destiny

I was counting on my destiny,
but, destiny was counting on me.
I hoped for a miracle,
that,
fortunes will turn around,
probably one fine day.
I kept on counting on fortune,
but, fortunes?
Well, they were counting on me.

Breezes came, 
they kissed the leaves.
Regardless, 
leaves counted on nature, that, 
a change of seasons would revive them.
Their story was written on leaves,
their story was counting on leaves,
But, leaves?
Well, they were counting on seasons.

Ages passed by, 
staring at these palm lines,
some are thick, 
some are thin,
some are straight, 
some curved or tangled.
It’s been so long that,
the lines are fading away now
You were counting on me,
but, me?
Well,
I was counting on my destiny.

Sunday, 27 May 2018

अकेले ही चल पड़ा

जिंदगी का ये जो सफर है,
उसमे हमेशा तुम्हे एक
चुनाव करना पड़ेगा,
किसी के साथ चलो
या फिर दूर तक चलो।

मैं दूर तक जाने की
तलब रखने वालों में से हूँ,
पर, मुझे अकेला चलना
भी अखरता है।
अकेले चलने की
आदत में, मैं
शून्यता की ओर चल पड़ा। 
वैसे तो मुझे तब कुछ
पता भी नहीं पड़ा,
मैं खेल के नियमानुसार
अकेले ही चल पड़ा।

कल शनिवार को
काली बदरी वाली शाम में,
मैं बिना छाता लिए
यूँ ही निकल पड़ा।
फिर, एकांत में पार्क
में बैठा सोचने लगा,
क्या अकेला चलना सही है ?
तो अंदर से आवाज़ आयी,
वो फिर कभी सोचना,
अभी सही वक़्त नहीं है,
तुम खुश हो अकेले।
फिर मैं खेल के नियमानुसार,
हमेशा की तरह
अकेले ही चल पड़ा।

वो लैंप पोस्ट की
पीली धुंधली बत्ती
मुझे जैसे सहला रही थी,
कोई सवाल करने वाला नहीं,
कोई जवाब देने वाला नहीं,
वो सुनसान सड़क जैसे
मेरे सपनों का जहाँ था।
मैं खुद में मगन,
हँसता, मुस्कुराता,
खेल के नियमानुसार,
हमेशा की तरह
फिर अकेले ही चल पड़ा। 

Wednesday, 23 May 2018

एक दिन सोचा

कल एक काम
बाकी रह गया था,
आज याद आया,
तो सोचा
चलो कर आते हैं।

तुम्हारे जाने के बाद,
जब घर साफ़ कर रहा था,
एक तस्वीर मिली,
मेरे जैसी शक्ल का कोई
इंसान हंस रहा था उसमे,
तो सोचा
चलो हंस आते हैं। 

लोग आते जाते
सवाल पूछा करते थे,
मैं बुत बना देखा करता,
किंकर्त्तव्यविमूढ़,
तो सोचा एक दिन कि
चलो जवाब दे आते हैं

कश्मकश में मैं
हर वक़्त उलझा रहता,
ये करते वक़्त कभी
वो कर बैठता,
और वो करते वक़्त
कुछ और सोचता,
तो सोचा फिर मैंने कि
चलो सब छोड़ आते हैं

बहुत भाग दौड़ की, 
बहुत कुछ देखा और सुना।
फिर एक दिन थक गया मैं,
एक लम्बी सांस ली,
थोड़ी देर ठहरा,
और सोचा,
चलो अब मर जाते हैं।