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Saturday, 23 March 2019

कभी नहीं

मेरी डायरी के वो सूखे मुरझाये फूल
जो मैंने कभी तुम्हे दिए ही नहीं

वो छत के कोने में रखी टूटी कुर्सी
जिसपे हम कभी साथ बैठे ही नहीं

वो छज्जे पर छुपा कर रखे पटाखे
जो हमने दिवाली में कभी जलाये नहीं

वो अलमारी में कपड़ो के तह के नीचे छुपाये खत
जो मैंने कभी हाथों में रख कर पढ़े ही नहीं

वो दिल में रखी एक बात
जो कभी मैंने तुमसे कही नहीं

वो तुम्हारे साथ वाली एक जिंदगी
जो शायद मैंने कभी जी ही नहीं 

Friday, 31 August 2018

जाने दो

जाने दो उसको,
आखिर कब तब उन
लम्हो में रहोगे ?
वो लम्हा कब का 
गुजर चुका है। 
कब तक तुम 
उनको थामे बैठे रहोगे,
अरे जाने दो ना,
छोड़ो जो हुआ, 
जाने दो। 

वो जो डोर थी, वो 
दो लोगों को थामनी थी। 
उसने तो अपना सिरा 
यूँही गिरा दिया, 
और तुम हो कि
अभी भी वो 
डोर पकड़े बैठे हो। 
अरे हाथों में
छाले पड़ जायेंगे, 
छोड़ो उस डोर को। 
जाने दो जो हुआ 
छोड़ो,
जाने दो।

आखिर किस बात का डर तुम्हे,
दो कदम आगे तो बढ़ो यहाँ से,
बंधनो से आज़ाद करो खुद को। 
जो बीत गया वो,
जाने दो।
आगे काफी कुछ आएगा,
उनको जरा आने दो,
जो हुआ उसे जाने दो, 
चलो छोड़ो,
जाने दो।

Tuesday, 3 July 2018

ऐसा पहली बार नहीं था

सुबह सुबह एक ख्याल से
आज मेरी नींद खुल गयी। 
ऐसा नहीं था कि मैंने फिर
सोने की कोशिश नहीं की,
पर नींद नहीं आती थी। 
मैं शायद फिर सोना ही
नहीं चाहता था। 
मुझे डर लगने लगा था,
सोते वक़्त आने वाले
उन सपनों से।
ऐसा पहली बार नहीं था,
पहले भी हो चुका था।

मुझे पता था मैंने जो
किया, वो गलत था,
मैं शायद सही कर
तो सकता था पर,
मैंने उसे टाल दिया था, 
ये सोचकर कि मेरे
अभी पास वक़्त है।
ऐसा पहली बार नहीं था,
मैं पहले भी ऐसा कर चुका था।

पर, इस बार मैं गलत था
मेरे पास वक़्त नहीं था।
बहुत देर कर दी
इस बार, बहुत देर।
वो चले गए फिर।
मैंने अपनी डायरी में
सब लिख तो दिया था,
पर,
किसी को कभी कुछ कहा नहीं।
ऐसा पहली बार नहीं था,
पहले भी मैं ऐसा कर चुका था।
शायद मुझे ऐसा
नहीं करना चाहिए था।