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Friday, 22 May 2020

एकत्व

कोई अर्थ नहीं, किसी 
और के स्तित्व का यहाँ | 
एक ये मेरा जीवन है, 
और, ये एकमात्र 
मेरा एकत्व है |

ऊपर कौन भगवान,
और, नीचे कौन शैतान,
कुछ मायने नहीं 
किसी के भी यहाँ | 
कुछ है तो, 
मिला जुला कर 
मैं ही हूँ बस |
कोई और नहीं यहाँ ,
बस एक मैं हूँ 
और एक मेरा एकत्व है |

ये सभ्यता समाज,
ये दोस्त परिवार ,
सब क्षणिक हैं |
ये रंग रूप, 
ये दौलत शोहरत, 
सब सामयिक हैं | 
जो कुछ अक्षय है, 
वो एक मैं हूँ बस | 
एक मेरा जीवन है, 
और एक ये मेरा एकत्व है |

Tuesday, 3 July 2018

ऐसा पहली बार नहीं था

सुबह सुबह एक ख्याल से
आज मेरी नींद खुल गयी। 
ऐसा नहीं था कि मैंने फिर
सोने की कोशिश नहीं की,
पर नींद नहीं आती थी। 
मैं शायद फिर सोना ही
नहीं चाहता था। 
मुझे डर लगने लगा था,
सोते वक़्त आने वाले
उन सपनों से।
ऐसा पहली बार नहीं था,
पहले भी हो चुका था।

मुझे पता था मैंने जो
किया, वो गलत था,
मैं शायद सही कर
तो सकता था पर,
मैंने उसे टाल दिया था, 
ये सोचकर कि मेरे
अभी पास वक़्त है।
ऐसा पहली बार नहीं था,
मैं पहले भी ऐसा कर चुका था।

पर, इस बार मैं गलत था
मेरे पास वक़्त नहीं था।
बहुत देर कर दी
इस बार, बहुत देर।
वो चले गए फिर।
मैंने अपनी डायरी में
सब लिख तो दिया था,
पर,
किसी को कभी कुछ कहा नहीं।
ऐसा पहली बार नहीं था,
पहले भी मैं ऐसा कर चुका था।
शायद मुझे ऐसा
नहीं करना चाहिए था। 

Wednesday, 23 May 2018

एक दिन सोचा

कल एक काम
बाकी रह गया था,
आज याद आया,
तो सोचा
चलो कर आते हैं।

तुम्हारे जाने के बाद,
जब घर साफ़ कर रहा था,
एक तस्वीर मिली,
मेरे जैसी शक्ल का कोई
इंसान हंस रहा था उसमे,
तो सोचा
चलो हंस आते हैं। 

लोग आते जाते
सवाल पूछा करते थे,
मैं बुत बना देखा करता,
किंकर्त्तव्यविमूढ़,
तो सोचा एक दिन कि
चलो जवाब दे आते हैं

कश्मकश में मैं
हर वक़्त उलझा रहता,
ये करते वक़्त कभी
वो कर बैठता,
और वो करते वक़्त
कुछ और सोचता,
तो सोचा फिर मैंने कि
चलो सब छोड़ आते हैं

बहुत भाग दौड़ की, 
बहुत कुछ देखा और सुना।
फिर एक दिन थक गया मैं,
एक लम्बी सांस ली,
थोड़ी देर ठहरा,
और सोचा,
चलो अब मर जाते हैं।