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Sunday, 6 September 2020

दिन-रात

दिन दिन होता है ,
और रात रात होती है | 
क्या करूँगा मैं, जब
दिन और रात का अंतर मिट जाए ?
जब दिन भी अंधेर हो जाए 
या, फिर रात भी उज्ज्वलित हो उठे ?
क्या करूँगा मैं तब ?
आप क्या करेंगे ? 

जब, 
रात के वो ढाई बजे वाले ख्यालात, 
दिन के दूसरे पहर में, 
तल्खी सी डेढ़ बजे वाली 
धूप में चुभने लगे,
तो तुम ही बताओ, क्या 
महसूस करूँअब मैं, 
अच्छा हुआ या बुरा?

जब 
गर्मी की छुट्टियों के दिनों वाली 
दुपहरी की खामोशी 
रातों को भी अखरने लगे 
तो तुम ही बताओ, क्या 
महसूस करूँअब मैं, 
अच्छा हुआ या बुरा?

अच्छा,
यूँ की रात अब अकेली नहीं 
उसे दिन का सहारा मिल गया है, 
रात सहम नहीं जायेगी यकायक | 

बुरा, 
यूँ कि पहले अमां, 
कम से कमएक वक़्त का तो चैन था, 
अब तो दिन रात दोनों चौपट हो बैठे | 

Tuesday, 4 September 2018

Don't let go

Don't let go,
You have the time now,
You can pause this moment,
You can live it to fullest.
But, don't assume 
You can live this moment forever,
Don't take it for granted.
Time never stops, time moves.
It moves on.
Don't let go,
Hold on,
Hold on until you can,
Don't let go.

You're the air, 
I'd love to breathe.
You're the vision,
I'd want to seathe.
You're the one who
words can't cover beneath .
But one day, 
that'll be it.
Today isn't that day,
Don't let go,
Hold on,
Hold on until you can,
Don't let go.

Will there be a world,
Will there be a time,
where we'll sit under stars,
together,
admiring the moonlight,
and the countless stars,
just me and you ?
Will there be a world,
Will there be a time,
Where I ask myself
What if I hadn't let you go ?
What if you'd told me
Dont let go,
Hold on to me,
Hold on until you can,
Don't let go?

Saturday, 4 August 2018

दो कौड़ी

जब बीतते वक़्त के साथ
मैं खर्च होने लगा था, 
और जेबें खाली हो चली थी,
तो मेरे हर खर्चे पर 
तुम सवाल उठाने लगे थे।
मैं आखिर जवाब भी
दूँ, तो क्या दूँ तुम्हे ?
अरे, जब जिंदगी की कीमत
ही कौड़ियों में थी, तो
फिर उनको खर्चने के
बाद, आखिर बचा भी
होता तो क्या होता ?

सपने बुनने के लिए
जब मेरी जेब में रेशम
खरीदने के पैसे नहीं बचे,
तो मैंने फिर जिंदगी
बेचकर, दो कौड़ी में
अपने लिए एक सुकून
वाली कब्र खरीद ली थी ।
दो कौड़ी की इस जिंदगी
को मैंने फिर बख्श दिया,
उसे इस जिल्लत से भी
आज रिहाई दे दी थी। 

पर मैं ये कभी
समझ नहीं पाया कि,
दो कौड़ी की जिंदगी,
असल में,
शायद,
दो कौड़ी से
ज्यादा महंगी थी।

Tuesday, 3 July 2018

ऐसा पहली बार नहीं था

सुबह सुबह एक ख्याल से
आज मेरी नींद खुल गयी। 
ऐसा नहीं था कि मैंने फिर
सोने की कोशिश नहीं की,
पर नींद नहीं आती थी। 
मैं शायद फिर सोना ही
नहीं चाहता था। 
मुझे डर लगने लगा था,
सोते वक़्त आने वाले
उन सपनों से।
ऐसा पहली बार नहीं था,
पहले भी हो चुका था।

मुझे पता था मैंने जो
किया, वो गलत था,
मैं शायद सही कर
तो सकता था पर,
मैंने उसे टाल दिया था, 
ये सोचकर कि मेरे
अभी पास वक़्त है।
ऐसा पहली बार नहीं था,
मैं पहले भी ऐसा कर चुका था।

पर, इस बार मैं गलत था
मेरे पास वक़्त नहीं था।
बहुत देर कर दी
इस बार, बहुत देर।
वो चले गए फिर।
मैंने अपनी डायरी में
सब लिख तो दिया था,
पर,
किसी को कभी कुछ कहा नहीं।
ऐसा पहली बार नहीं था,
पहले भी मैं ऐसा कर चुका था।
शायद मुझे ऐसा
नहीं करना चाहिए था। 

Tuesday, 12 June 2018

आज वो दिन नहीं है

उसने पूछा तुम्हारी
इतनी सारी कविताऍं हैं, 
एक किताब लिखने का 
क्यूँ नहीं सोचते हो ?
मैं कहता, 
मैं तो बस हताशा में, 
इस जहाँ के बेबाक से 
नियमों से, रीति-रिवाज़ों से,
परेशां होकर, हार कर, 
उसके सामने घुटने टेक कर,
आत्म-समर्पण करने के बाद,
खुद से चल रहे संघर्ष से 
थक कर चूर होने के बाद 
ही कुछ लिख पाता हूँ। 

जिस दिन मैं इन सब से 
थोड़ा ऊपर उठ कर,
जब मुझे इन सब की 
या तो आदत हो जायेगी, 
या परवाह नहीं होगी, 
या फिर जब मैं 
वास्तव में खुश
होकर लिखूंगा,
वो दिन होगा, जब 
मैं किताब भी लिखूंगा 
पर,
आज वो दिन नहीं है,
आज वो दिन नहीं है।

Wednesday, 21 February 2018

गुमशुदगी की रिपोर्ट

एक मिनट सर,
आपको थाने का
पता मालूम है क्या ?
एक रिपोर्ट लिखवानी है |
अच्छा, थाना पीछे रह गया ?
शुक्रिया, सही बात है
थाना तो पीछे छूट गया |

दरोगा साहेब, हमको इक
रपट लिखवानी है |
एक गुमशुदगी की
रपट लिख देंगे जरा
कौन गुम हो गया अब ?
कोई नाम, पता,
उम्र कुछ बताओ |

उम्र तो उसकी साहब
बहुत ज्यादा होगी,
करीबन करीबन सदियां |
पता तो नहीं मालूम उसका,
सोचा था हर जगह रहता होगा |

अरे क्या बकवास कर रहे हो ?
क्या नाम है उसका ?
इंसानियत नाम है साहब
इंसानियत के गुमशुदगी की
रिपोर्ट लिखवानी है जरा 

Saturday, 23 December 2017

उम्र हो चली है

झुर्रियाँ देखी है अपने चेहरे पर ?
हाथ की धुंधलाती लकीरें देखी
हैं ? उम्र हो चली है तुम्हारी

केशों का स्याहपन चला गया
जो थोड़ी फसल बची है , उसमे
सफेदी ही सफेदी बिखरी है
क्यों ? उम्र हो चली है तुम्हारी

लाठी भूल गए हो अपनी
चलना दुश्वार हो रहा होगा
जो, उम्र हो चली है तुम्हारी

ये उँगलियाँ दिख रही है? कितनी ?
अरे चश्मा लगाइये जनाब
वज़ह ? उम्र हो चली है तुम्हारी

किधर तलाश रहे अब आप, उफ्फ
याद भी कहाँ रहता है आपको
माथे पर से चश्मा नीचे सरकाइये
अब तो, उम्र हो चली है तुम्हारी

वैद्य और हकीम से फुर्सत कहाँ
मर्ज़ की तहकीकात और इलाज में
गुज़र रहा ये थोड़ा बाकी जो
वक्त , क्या है उम्र हो चली है तुम्हारी

सो जाइये, थम जाइये
कितना संघर्ष कीजियेगा
हालात बदलना आपके बस की बात नहीं
वो यूँ कि उम्र हो चली है तुम्हारी